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जैसे गोताखोर मोती पाने के लिए समुद्र में डुबकी लगाता है वैसे ही दार्शनिक
प्रकृति का व्यक्ति परमात्मा को ज्ञान मार्ग से पाना चाहता है । वह इस
संसार
की
छोटी-छोटी वस्तुओं से सन्तुष्ट होने वाला मनुष्य नहीं है । अनेक ग्रन्थों
के अवलोकन से भी उसे सन्तुष्टि नहीं मिलती । उसकी आत्मा सत्य को उसके
प्रकृत रूप में देखना चाहती है और उस सत्य-स्वरूप का अनुभव करके,
तद्रूप होकर,
उस सर्वव्यापी परमात्मा के साथ एक होकर सत्ता के अन्तराल में समा जाना
चाहती है । ऐसे दार्शनिक के लिए तो ईश्वर उसके जीवन का जीवन है,
उसकी आत्मा की आत्मा है । ईश्वर स्वयं उसी की आत्मा है । ऐसी कोई अन्य
वस्तु शेष ही नहीं रह जाती,
जो ईश्वर न हो
।
द्वा
सुपर्णा
सयुजा
सखाया
समानं
वृक्षं परिषस्वजाते
।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वादु अत्ति अनश्नन्नन्यो अभिचाक शीति
।
समाने
वृक्षे
पुरुषो निमग्नो
नीशया
शोचति
मुह्यमान:
।
जुष्टं
यदा
पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति
वीतशोक:
।
(कठोपनिषद्
3-1-1
व
2)
एक ही वृक्ष पर
दो
पक्षी हैं,
एक चोटी पर दूसरा नीचे । चोटी पर रहने वाला पक्षी शान्त,
मौन,
महिमाशाली और अपने ही ऐश्वर्य में मग्न है । नीचे की शाखाओं पर रहने वाला
पक्षी,
बारी-बारी से,
मधुर और कटु फल खाता हुआ सुखी और दु:खी होता रहता है । कुछ काल के पश्चात्
अत्यन्त कटु फल खाकर वह त्रस्त हो जाता है और ऊपर बैठे स्वर्ण पंख वाले
पक्षी को देखता है जो कोई फल नहीं खाता । नीचे वाला पक्षी ऊपर वाले पक्षी
के समीप पहुँचने का प्रयत्न करता है । ऊपर वाले पक्षी के पास पहुँच कर नीचे
वाले पक्षी को ज्ञात होता है कि वह केवल छाया मात्र है । वास्तविक पक्षी एक
ही है । ऊपर वाला पक्षी इस विश्व का प्रभु ईश्वर है और नीचे वाला पक्षी इस
संसार के मधुर और कटु फलों का भक्षक जीवात्मा है । इन्द्रिय सुखों से ऊपर
उठकर जीवात्मा को पता चलता है कि वह भी स्वरूपत: ब्रह्म ही है
।
ज्ञान योग की व्याख्या
उपनिषदों में की गयी है । इसीलिए इस योग के तीन ही सोपान हैं-(१)श्रवण
(उपनिषदों में कही गयी बातों को सुनना या पढ़ना);
(२)
मनन (श्रवण किये गये मन्तव्य पर चिन्तन करना
(३) निदिध्यासन (सभी वस्तुओं से अपना ध्यान
हटाकर साक्षी पक्षी की तरह बन जाना) । स्वयं को तथा संसार को ब्रह्ममय
समझने से ब्रह्म से एकत्व स्थापित हो जाता है
। |